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प्रधानमंत्री विश्वकर्मा योजना: पारंपरिक कौशल को सशक्त करता बिहार कौशल विकास मिशन

प्रधानमंत्री विश्वकर्मा योजना: पारंपरिक कौशल को सशक्त करता बिहार कौशल विकास मिशन

बिहार कौशल विकास मिशन के अंतर्गत केंद्र सरकार की “प्रधानमंत्री विश्वकर्मा योजना” राज्य के पारंपरिक कारीगरों और शिल्पकारों के लिए आशा की नई किरण बनकर उभरी है। वित्तीय वर्ष 2024-25 से राज्य के सभी सरकारी औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थानों (आईटीआई) में इस योजना का प्रभावी क्रियान्वयन प्रारंभ हो चुका है। इसका उद्देश्य पारंपरिक कारीगरों को पहचान देना, उनका कौशल उन्नयन करना और उन्हें आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाना है।

इस योजना के अंतर्गत बिहार राज्य के बढ़ई, लोहार, सुनार, दर्जी, राजमिस्त्री, नाई, धोबी, माला निर्माता, मूर्तिकार जैसे 18 प्रकार के पारंपरिक पेशों से जुड़े कारीगरों को प्रशिक्षण, टूलकिट, ऋण सुविधा एवं मार्केट लिंकेज जैसी सुविधाएँ प्रदान की जा रही हैं। चयनित लाभार्थियों को 40 घंटे का बुनियादी प्रशिक्षण दिया जाता है, जिसमें टूलकिट संचालन, डिजिटल और वित्तीय साक्षरता, ब्रांडिंग और स्वरोजगार पर विशेष ध्यान दिया जाता है।

बिहार के इच्छुक अभ्यर्थी इसके बाद 120 घंटे के उन्नत प्रशिक्षण के लिए भी नामांकन कर सकते हैं। प्रशिक्षण के दौरान ₹500 प्रतिदिन की प्रोत्साहन राशि एवं मूल्यांकन उपरांत ₹1000 अतिरिक्त राशि दी जाती है। साथ ही, ₹15000 का टूलकिट ई-वाउचर भी प्रदान किया जाता है।

राज्य के 54 आईटीआई संस्थानों में प्रशिक्षण कार्यक्रम शुरू हो चुका है, जिसमें अब तक 1854 कारीगरों को प्रशिक्षित किया जा चुका है एवं 2806 प्रशिक्षणरत हैं। यह योजना न केवल पारंपरिक व्यवसायों को सशक्त बना रही है, बल्कि बिहार को कौशल आधारित अर्थव्यवस्था की ओर अग्रसर कर रही है।

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